
बाट फूलों की
सटे हटे, हटे सटे, मिलते गले
गीली क्यारियों में हैं सजे
मेरे तेरे, तेरे मेरे, बोलों के सिलसिले
लहलहाते, दूर तक फैलते
बाट फूलों के फसल की जोहते
देखो रंग दबाए, फूल छिपाए,
कलियाँ काँपें, नया कोई आए
तो पंखुड़ियाँ खोल वो बात बताएं
जो मिट्टी की तहों में
हमने कंठ उतार संजोए
पहली क्यारी बजेगी बोगनविलियों की बारात
वहाँ, चंपा करेगी उस साँझ की बात
जब तुम घर ना आए
दाढ़ी बढ़ाए, सुबह कहा
कुछ पैसे तुम्हारी माँ के लिए कमाए
उस कोने पीले उड़हुल
जब बिजली निगम ने की गुल
बत्ती, और तुम गायीं मोमबत्ती
पर छंदें, खुद की बनाई
वो पिटूनिया क्यारी, थरथराएगी बैंगनी
होठों की तरह, जब पेट पकड़
तुमने दिखाई दर्द की जगह
यहाँ जहाँ हवा धूप उड़ाती
आएंगी लाल चहचहाती रुक्मिणी
गेंदें लिए, डाल बढ़ातीं
मैंनाओं को बुलातीं
रहेंगी सर डुलाती, कतराती
जब तक ना आती
आवाज़ छोटी और नयी
सटे हटे, हटे सटे, मिलते गले
गीली क्यारियों में हैं सजे
मेरे तेरे, तेरे मेरे, बोलों के सिलसिले
लहलहाते, दूर तक फैलते
बाट फूलों के फसल की जोहते
– बोलबुल

हमिंगबर्ड
अजनबी शहर में, जो तुमने बढ़ाई
दोस्ती की बातों की टहनी
उसपर बैठेगी, बार बार दिल की
ठहर ठहर उड़ती
चिड़िया हमिंगबर्ड सी
लगा था बेउड़े मरेगी
कैसे ऐसे सहेगी
खच खच शहर में
दिमागों की काँव काँव
कहाँ बैठेगी जहाँ
कुर्सियां लगातीं
कुश्ती के एक एक दाँव
हर सर लगे हैं छज्जे
धूप में जलाते पाँव
और बड़ी है जिधर
दोस्ती की डालोंं की कमी
उनके फूलों में नमी
अजनबी शहर में, जो तुमने बढ़ाई
दोस्ती की बातों की टहनी
उसपर बैठेगी, बार बार दिल की
ठहर ठहर उड़ती
चिड़िया हमिंगबर्ड सी
यहाँ आकर दुबकी थी
कोटर तक सिमटी थी
अब जो तुमने किया है
उड़ने को मज़बूर
आँखों के दिए हैं फूल
डुबा चोंच पिएगी
बोल गिन गिन जिएगी
हवा में तुम्हारी
पंख फटक थिरकेगी
चिड़िया दिल की
अजनबी शहर में, जो तुमने बढ़ाई
दोस्ती की बातों की टहनी
उसपर बैठेगी, बार बार दिल की
ठहर ठहर उड़ती
चिड़िया हमिंगबर्ड सी
– बोलबुल

ग्रह शह
होगी कोई वजह
कि सीने में उसके
मेरी बनती नहीं जगह…
प्यार की बातों से
जैसे कतराती रहती है वह,
शक बड़ा है हो रहा अब मुझको रह रह,
दूर आसमान में बैठा कोई ग्रह
दे रहा है इश्क को हमारे शह
सोचता हूँ दिन रात
राहू, केतु, शनि… जिसकी भी हो सकती है ख़ुराफ़ात
अगर मैं कर सकता अपने साथ,
समझा पाता मन की बात
तो करती वो ज़रूर मुझसे खुल के मुलाकात
ओ आसमान के साहबात…
चढ़ाउँगा मोती, मूंगा, पुखराज
नीलम, हीरा जो भी प्रिय है सौगात
जकड़ भी लूँगा अँगूठियों से हाथ,
मगर ख़त्म कर दो उत्पात,
खा लो इश्क से तुम भी मात
जीतने दो जंगे जिगर की बिसात,
पकड़ने दो हमको हाथों में हाथ…
होगी कोई वजह
कि सीने में उसके
मेरी बनती नहीं जगह…
– बोलबुल

बोझ सीने का
बोझ सीने का
घूँटों से तोलने का,
बोतलों से मोलने का,
झूठों में भूलने का,
कर गिलास खाली… स्साथ लुढ़काने का
जिसने दे दी है चोट,
लगा दी सीने में ख़रोंच,
उसकी बात ना पूछने का,
डाल प्याली में… याद घोंटने का
नोट फेंकने का
जिधर प्यार है बेचने का,
दो चार ख़रीदने का,
बेटा तान के सीना… फिर से जीने का
ज़िन्दगी में इक दफ़ा
आजमा ले बोतल की वफ़ा,
ले ले चूमने का मज़ा,
सीने से लगा शीशे की दिलरुबा,
होठों से सटा… टूटे वादों की दवा
जो था ही नहीं अपना,
उसका नशे में डूबे सपना,
बोझ हो जाए हवा
सीना हल्का हल्का।
ले ले उसकी जगह, साथ दे शामो सुबह
जो कभी ना दे दग़ा… बने जीने की वजह
बोझ सीने का
घूँटों से तोलने का,
बोतलों से मोलने का,
झूठों में भूलने का,
कर गिलास खाली… स्साथ लुढ़काने का
– बोलबुल

नाप
क्यूँ पंख खोले नापती आकाश चिड़िया
ना छोटा पड़ेगा, भाँपती
लिए अरमान चिड़िया
कि भर देंगे आसमान
उसके छे छिपे चाँद
गाकर बुलबुलों से बोल
उड़ती हवा पे डोल
कि शोर की नदी के पार
जहाँ प्यासे घाट लगे कतार
सुनाएंगे माँ के गाने
खे पंखों की पतवार
कि होंगे आले फ़नकार
सरों से चहचहा उतार
देंगे झुरमुटों के पुराने
तराने भूलने का भार
कि देख मेरी उड़ान
कोई गर मंशा जाए जान
ले उसकी भी पहचान
मेरे छे निकलते चाँद
भरेंगे आसमान में जान
क्यूँ पंख खोले नापती आकाश चिड़िया
ना छोटा पड़ेगा, भाँपती
लिए अरमान चिड़िया
– बोलबुल

बारहसिंगा
आसमानी मेज़ पर पड़ी
कल बजी जो भोर की घड़ी
तो मैं, जैसे उसकी घूमती सूई
टिकटिकाते पैर, सड़क पर निकल चली
भीड़ संग हमकदम
छुआ जो मेट्रो स्टेशन
कि टोका मुझे
आराम से खड़़े, एक राहखंभ ने
बाँह बिजली के फूल नारंग
बोता सर्दी में पलाशरंग
सुसुम, मधुगंध
जैसे कोई कस्तूरी हिरण
उसपे टिका था
ज़ुदा-दिल, सोच रहा था
इस रेले में यूँ, रहूँ तो कैसे ज़िंदा
मैं चारा… मेट्रो परिंदा,
चुग ले गई जहाँ
नकली हवा धूप में
चुभी, कांटे दर कांटे घड़ी…
रो रूह बोली, ला कस्तूरी
लौटी तो, खुर पटकती बयार
लगी उड़ाने लहरों में पत्ते
गत्ते, ऊनी कपड़े, इश्तहार
छिटके कलाई घड़ी के कांटे
जा सजे बारहों, बन लहरदार
जहाँ राहखंभ टिका था
तांबई रंग का
बेपलक घूरता, बारहसिंगा
जंगल सा चौड़ा सीना
बादल जैसे बाल
ठहरी नदी सी नज़रें
गीत खचित भाल
मुड़ चला वो आहिस्ते
खुली कार में सवार
छोड़ मेरे लिए
एक बरसों से रूकी
मगर मुस्कुराती घड़ी…
जैसे हो ज़िंदा
आसमानी मेज़ पर पड़ी
कल बजी जो भोर की घड़ी
तो मैं, जैसे उसकी घूमती सूई
टिकटिकाते पैर, सड़क पर निकल चली
– बोलबुल

लटों का कोड़ा
लग के थोड़ा
लटों का कोड़ा
मचला रफ़्तार.पकड़ने
साथ हवा के बातें करने
ज़न्नत की सैर पर निकलने
दिल का मेरा घोड़ा
टप टप टप टप
लगा पैरों को ज़मीं पर पटकने
इरादों को हमसफ़र के परखने
उठा कर साथ साथ उड़ने
उछला दिल का मेरा घोड़ा
शहर की चहल पहल में
घर, औफ़िस, होटल में
ज़िंदगी की उथल पुथल में
खड़ा था अकेला सा
जैसे बंद अस्तबल में
अब उसने जो फाटक खोला
चढ़ी कुंडी को नीचे धकेला
आई हवा लटों से
गरम गरम खुशबू, नम नथुनों में
निकला गलियों, कूचों, सड़कों में
कदमताल इतरा के करते
नालों की ताल पर बढ़ते
दिल का मेरा घोड़ा
सरपट सरपट
पा लटों का प्यारा कोड़ा
बन गया जोड़ा
दिल का मेरा घोड़ा
(लग के थोड़ा
लटों का कोड़ा
मचला इश्क की सरहद छूने
ज़मीन आसमान के चूमने कोने
फांदने रोड़े रास्तों के… चाहे हों जितने
दिल का मेरा घोड़ा)
– बोलबुल

राह सजी
सखी री, राह मेरी
सजेगी और मुझसे भी
देखना, देखेंगे लोग
मुड़ के, सालों बाद भी
छोड़ आईने का मोह
आँखें क्षितिज से जोड़
छितरा देगी राह मेरी
मोती मेहनत के, बेगिनती
किनारों पर
नकाबों में हँसते
व्याधों से मिलके
लेगी कभी राह मेरी
हिसाब पुरानी
सच, बिजली सी बरसा के
कंचे खनकाती
तंग गलियों से टकराती
मिलेगी कच्चों बच्चों से
टमाटर सी नाक लिए
बेवजह गुदगुदाती
और जब सांसों का हार उतार कर
रख दूँगी मैं राह पर,
समेत लेगी आँचल में रेत
जहाँ है फैला
समुंदर समय का नीला
सखी री, राह मेरी
सजेगी और मुझसे भी
देखना, देखेंगे लोग
मुड़ के, सालों बाद भी
– बोलबुल

