Hindi Lyrics from Collection

हमिंगबर्ड
अजनबी शहर में, जो तुमने बढ़ाई
दोस्ती की बातों की टहनी
उसपर बैठेगी, बार बार दिल की
ठहर ठहर उड़ती
चिड़िया हमिंगबर्ड सी
लगा था बेउड़े मरेगी
कैसे ऐसे सहेगी
खच खच शहर में
दिमागों की काँव काँव
कहाँ बैठेगी जहाँ कुर्सियां लगातीं
कुश्ती के एक एक दाँव
हर सर लगे हैं छज्जे
धूप में जलाते पाँव
और बड़ी है जिधर
दोस्ती की डालोंं की कमी
उनके फूलों में नमी
अजनबी शहर में, जो तुमने बढ़ाई
दोस्ती की बातों की टहनी
उसपर बैठेगी, बार बार दिल की
ठहर ठहर उड़ती
चिड़िया हमिंगबर्ड सी
यहाँ आकर दुबकी थी
कोटर तक सिमटी थी
अब जो तुमने किया है
उड़ने को मजबूर
आँखों के दिए हैं फूल
डुबा चोंच पिएगी
बोल गिन गिन जिएगी
हवा में तुम्हारी पंख फटक थिरकेगी
चिड़िया दिल की
अजनबी शहर में, जो तुमने बढ़ाई
दोस्ती की बातों की टहनी
उसपर बैठेगी, बार बार दिल की
ठहर ठहर उड़ती
चिड़िया हमिंगबर्ड सी
– बोलबुल

बाट फूलों की
सटे हटे, हटे सटे, मिलते गले
गीली क्यारियों में हैं सजे
मेरे तेरे, तेरे मेरे, बोलों के सिलसिले
लहलहाते, दूर तक फैलते
बाट फूलों के फसल की जोहते
देखो रंग दबाए, फूल छिपाए,
कलियाँ काँपें, नया कोई आए
तो पंखुड़ियाँ खोल वो बात बताएं
जो मिट्टी की तहों में
हमने कंठ उतार संजोए
पहली क्यारी बजेगी बोगनविलियों की बारात
वहाँ, चंपा करेगी उस साँझ की बात
जब तुम घर ना आए
दाढ़ी बढ़ाए… सुबह कहा
कुछ पैसे तुम्हारी माँ के लिए कमाए
उस कोने पीले उड़हुल
जब बिजली निगम ने की गुल
बत्ती, और तुम गायीं मोमबत्ती
पर छंदें, खुद की बनाई
वो पिटूनिया क्यारी, थरथराएगी बैंगनी
होठों की तरह, जब पेट पकड़
तुमने दिखाई दर्द की जगह
यहाँ जहाँ हवा धूप उड़ाती
आएंगी लाल रुक्मिणी चहचहातीं
गेंदें लिए, डाल बढ़ातीं
मैंनाओं को बुलातीं
रहेंगी सर डुलाती, कतराती
जब तक ना आती
आवाज़ छोटी और नयी
सटे हटे, हटे सटे, मिलते गले
गीली क्यारियों में हैं सजे
मेरे तेरे, तेरे मेरे, बोलों के सिलसिले
लहलहाते, दूर तक फैलते
बाट फूलों के फसल की जोहते
– बोलबुल

ग्रह शह
होगी कोई वजह
कि सीने में उसके
मेरी बनती नहीं जगह…
प्यार की बातों से
जैसे कतराती रहती है वह,
शक बड़ा है हो रहा अब मुझको रह रह,
दूर आसमान में बैठा कोई ग्रह
दे रहा है इश्क को हमारे शह
सोचता हूँ दिन रात
राहू, केतु, शनि… जिसकी भी हो सकती है ख़ुराफ़ात
अगर मैं कर सकता अपने साथ,
समझा पाता मन की बात
तो करती वो ज़रूर मुझसे खुल के मुलाक़ात
ओ आसमान के साहबान…
चढ़ाउँगा मोती, मूंगा, पुखराज
नीलम, हीरा जो भी प्रिय है सौगात
जकड़ भी लूँगा अँगूठियों से हाथ,
मगर ख़त्म कर दो उत्पात,
खा लो इश्क से तुम भी मात
जीतने दो जंगे जिगर की बिसात,
पकड़ने दो हमको हाथों में हाथ…
होगी कोई वजह
कि सीने में उसके
मेरी बनती नहीं जगह…
– बोलबुल

बोझ सीने का
बोझ सीने का
घूँटों से तोलने का,
बोतलों से मोलने का,
झूठों में भूलने का,
कर गिलास खाली… स्साथ लुढ़काने का
जिसने दे दी है चोट,
लगा दी सीने में खरोंच,
उसकी बात ना पूछने का,
डाल प्याली में… याद घोंटने का
नोट फेंकने का
जिधर प्यार है बेचने का,
दो चार ख़रीदने का,
बेटा तान के सीना… फिर से जीने का
ज़िन्दगी में इक दफ़ा
आज़मा ले बोतल की वफ़ा,
ले ले चूमने का मज़ा,
सीने से लगा शीशे की दिलरुबा,
होठों से सटा… टूटे वादों की दवा
जो था ही नहीं अपना,
उसका नशे में डूबे सपना,
बोझ हो जाए हवा
सीना हल्का हल्का।
ले ले उसकी जगह, साथ दे शामो सुबह
जो कभी ना दे दग़ा… बने जीने की वजह
बोझ सीने का
घूँटों से तोलने का,
बोतलों से मोलने का,
झूठों में भूलने का,
कर गिलास खाली… स्साथ लुढ़काने का
– बोलबुल

छः छिपे चाँद
क्यूँ पंख खोले नापती आकाश चिड़िया…
ना छोटा पड़ेगा, भाँपती
लिए अरमान चिड़िया…
कि भर देंगे आसमान
उसके छः छिपे चाँद
गाकर बुलबुलों से बोल
उड़ती हवा पे डोल
कि शोर की नदी के पार
जहाँ प्यासे घाट लगे कतार
सुनाएंगे माँ के गाने
खे पंखों की पतवार
कि होंगे आले फ़नकार
सरों से चहचहा उतार
देंगे झुरमुटों के पुराने
तराने… भूलने का भार
कि देख मेरी उड़ान
कवि गर मंशा जाए जान
ले उसकी भी पहचान
मेरे छः निकलते चाँद
भरेंगे आसमान में जान
क्यूँ पंख खोले नापती आकाश चिड़िया…
ना छोटा पड़ेगा, भाँपती
लिए अरमान चिड़िया
– बोलबुल

सड़क भड़क
तड़क भड़क, तड़क भड़क
बढ़ रही सड़क
पटकाते, कतराते चलते जूते मेरे
खा पैसों की झिड़क
मोटरें छोटी बड़ीं
रास्तों में अड़ी भिड़ीं
कर रही हैं हर जगह, ट्रैफ़िक लाइटों से झड़प
दिखी नहीं पैदल चलने की ज़मीं
कि कर लेतीं वो झट से हड़प
लगातार चीखते चिल्लाते
हॉर्न मुझे जो डाँट पिलाते
उनसे बचते बचाते
चलते जूते मेरे, इज़्ज़त गड़प
एड़ियाँ छोटी बड़ीं
जूतियों से चिपकी सटीं
चमकती मोटरों से उतर रहीं, खटक खटक
इतः ततः मालकिनों को ढो रहीं, लचक लचक
भरमाते, लड़खड़ाते जूते मेरे
खो जाते सपनों में
देख के बस झलक
पीछे पीछे घुस जाते
शीशों के दरवाज़ों में
जहाँ मोलतीं वो कपड़े रेडी मेड,
इत्रदान, इतने मँहगे सामान
जैसे करती हों रुपयों से ही स्नान…
तोड़ देतीं पलक झपकते ध्यान
बढ़ जाते जूते मेरे, छोड़ के चमक दमक
जहाँ नसीब हों दो रोटी, थोड़ा नमक
तड़क भड़क, तड़क भड़क
बढ़ रही सड़क
पटकाते, कतराते चलते जूते मेरे
खा पैसों की झिड़क
– बोलबुल

लटों का कोड़ा
लग के थोड़ा
लटों का कोड़ा
मचला रफ़्तार.पकड़ने
साथ हवा के बातें करने
ज़न्नत की सैर पर निकलने
दिल का मेरा घोड़ा
टप टप टप टप
लगा पैरों को ज़मीं पर पटकने
इरादों को हमसफ़र के परखने
उठा कर साथ साथ उड़ने
उछला दिल का मेरा घोड़ा
शहर की चहल पहल में
घर, औफ़िस, होटल में
ज़िंदगी की उथल पुथल में
खड़ा था अकेला सा
जैसे बंद अस्तबल में
अब उसने जो फाटक खोला
चढ़ी कुंडी को नीचे धकेला
आई हवा लटों से
गरम गरम खुशबू, नम नथुनों में
निकला गलियों, कूचों, सड़कों में
कदमताल इतरा के करते
नालों की ताल पर बढ़ते
दिल का मेरा घोड़ा
सरपट सरपट
पा लटों का प्यारा कोड़ा
बन गया जोड़ा
दिल का मेरा घोड़ा
लग के थोड़ा
लटों का कोड़ा
– बोलबुल

कथककली
बाग़ान मेरा, बाल्कनी का
पैरों पे उसके झुक गया
पानी जो डाला, मिट्टी को गुदगुदाया
गला फूलों का भर गया
अब ठुड्डियाँ उठाए जो उँगली, फूलों की
फूल करें कथककली
छोड़ने चली फूलों को
तो कदम रुके,
बाँहें उसकी झुक गयीं
ले के गोद गमले को
चूमती वो किचन चली…
किचन मेरा हाथों से उसके सज गया
खेलने लगीं सब्जियां छुरी से
रोटियाँ तवे से
अब नीली पीली कुर्तियां लपटों को जो पहनाए
तो लपटें करें कथककली
खा खिला के डिनर
छोड़ किचन बैठने चली सोफ़े पर
तो सोफ़ा मेरा जो माँगता था मिन्नत
जन्नत पा गया
लचकती लताएँ, फलों फूलों के गुच्छे
रेशमी बाँहों से
लिपट उसके पैरों घुटनों से
लिए सौगात पुलक के
भेंट अपनी अर्पण करने लगे
अब उसने कशीदा किए
गुच्छों को जो थपथपाया
तो सोफ़े की हुई ज़िंदा
बगिया करे कथककली
बग़ीचा मेरा ज़र्रा ज़र्रा
पैरों पे उसके झुक गया
– बोलबुल

