Vine 5x

Graffiti

Coy wavelets, bubbles with burbles
And swells with sharkish undercurrents,
Adored his body as their favorite
Wall of muscle to paint.

Work began mornings –
With tuna or taco for lunch,
Moved till near-beers were thrown in,
Broke for larks with boys and sandy girlfriends,
Until that day’s thoughts were all written.
Then the Californian sun
Would prime the pickups and cottages lined lanes,
For him to respond in the dark
With his own air spray of comments.

– Bolbul


कल नहीं

कल मौत थी ग़ुस्से में,
तभी हवा तेज़ थी नथुनों में,
उड़ा रही थी पत्ते लक्कड़,
पर्दे, फ़र्निचर… चुनिंदा पुख्ता छप्पर!

उसे याद आया,
कई बार शाम ज़ोर दरवाज़ा खटखटाया –
नीचे, ऊपर, खिड़कियों पर
कोई आमादा था, घुसने को अंदर।

सुबह उजड़ों की खड़खड़ बीच
उसने पेड़ के रोते चिड़े से कहा,
मालूम तेरा घर बंद न होता…
चूँ चूँ सुना होता
तो दरवाज़े खोल देता।

– बोलबुल


चटक

आरज़ू मेंं दिखने की,
काँच एक खिड़की की,
सोचने लगी…
आरपार मेरे, सब देखें ऐसे
जैसे मैं कोई चीज़ ही नहीं!

ना नज़रें लड़ें तो
इश्क क्या होगा कभी?
क्यूँ कहेगा वो मुझे,
नायाब और नफ़ीस?

चाहत का, सर से पाँव,
इतना हुआ दबाव
कि चटखती रूह से आई
ज़ोर की आवाज़!

अब पास आ वो सोचे,
शुक्र कि चमड़ी नहीं हैं नज़रें,
जिनपर लगे खूबसूरती की धार,
देखो कितने ही बार!

– बोलबुल